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मंगलवार, जून 08, 2010
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ग़ज़ल: दरख़्त

Share सूखे पत्तों को जब आकर हवा उड़ाती है शाख के पत्तों की भी रूह कांप जाती है दरख़्त अपने ही पत्तों का हो नहीं पाता चिड़िया पागल है वहां घोंसल...

बुधवार, मई 19, 2010
ग़ज़ल- परिंदों लौट आना

ग़ज़ल- परिंदों लौट आना

Share परिंदों शाम को लौट आना घर ज़रा ज़ल्दी हम दीवारें इस ख़ामोशी से ऊब जातीं हैं उतने ही दानें चुनो जितनी ज़रूरत है हमें यहां कितनी च...

मंगलवार, मई 18, 2010
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(ग़ज़ल)साथ-साथ

Share वो मेरे ही साथ-साथ चलता रहा आंखों में झूठा ख़्वाब पलता रहा कुछ तो मिट्टी ही अपनी गीली है बारिश में घर से मैं निकलता रहा तेरा ख़...

शनिवार, मई 08, 2010
नई ग़ज़ल

नई ग़ज़ल

  अब आंखें बंद कैसे मैं कर सकूं बताओ तस्वीर देके तुम मुझे जगराते दे गए हो कोई नहीं यहाँ पर फिर भी नहीं अकेला याद आके मुझको महफिल में ले ...

गुरुवार, मई 06, 2010
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गज़ल (बूढी डायरी उपन्यास से)

Share   इस कहानी का बूढ़ा नायक दीवाली पर अपना पुराना  बक्सा खोलता है और उसमें रखा पुराना सामान देखकर उसे अपने बीते वक्त की याद आ जाती है त...

 
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