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शनिवार, नवंबर 13, 2010
ग़ज़ल: और उम्र दे

ग़ज़ल: और उम्र दे

ज़िंदगी ये मेरी बहुत कम है पड़ गयी  उनको है भूलना तो ख़ुदा और उम्र दे  दर्द मेरे घर का आंगन भी है बिस्तर भी  कुछ कोने अभी खाली ख़ुद...

मंगलवार, जून 01, 2010
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ग़ज़ल: दोस्त

 सुना है मेरा दिल दुखाएगा दोस्त है दोस्ती निभाएगा वो आंखों में शर्म रखता है सिर झुकाकर ही कतराएगा भीड़ में वो एहसान कर देगा नज़रें मिलीं...

 
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