होली : अशोक जमनानी अशोक जमनानी होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) -ashokjamnani@gmail.com http://www.ashokjamnani.com/
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नर्मदा यात्रा : 32 : एक कविता बरगी से नर्मदा तुम्हें निहारने के लिए पूरे चाँद वाली रात में मैंने चाँद बोया बरगी के आसमान में...
कविता : पलाश के फूलों वाले रंग जो शाख से जुदा हुए फिर मिट गए तुम्हारे लिए उन पलाश के फूलों वाले रंग हैं इन्हें पास आन...
हे राजन हे वयोवृद्ध राजन असुरक्षित सीमाएँ रिक्त कोष भ्रष्ट तंत्र सुप्त न्याय लोभी आमात्य लुटेरे व्यवसायी अपमानित नारी भ्रमित य...
कविता : नर्मदा लौट गयी नर्मदा लौट गयी नर्मदा अपने तटबंधों के मध्य नदी ने राह पकड़ ली पुरानी तो शहर सुकून महसूसता है पूजन पाठ श...